"हां साहब सबको नसीब नहीं होती ये 2 जून की रोटी"
आज 2 जून है और आज एक सबसे मशहूर अवधी कहाबत है कि 2 जून की रोटी सभी को नसीब नहीं होती हैं। 2 जून की रोटी का मतलब होता है 2 टाइम की रोटी
तो ये तो सभी जानते है कि आज भी भारत में दो टाइम की रोटी हर किसी को नहीं मिलती है. कोरोना काल में जो मजदूरों का दर्द सड़को पर देखने को मिला है वो यही दो जून की रोटी का दर्द है।
आज भी भारत में गरीबी औऱ भुखमरी इतनी है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना काल में देखने को ही मिल गया है. सरकारें लाख दावा करें, पूर्व सरकारें या पार्टियां भी लाख विकास की बात करें लेकिन सच यही है जो हमे आज देखने को मिल रहा है। सड़कों पर भटकते मजदूर, बेरोजगारी का नजारा, फुटपाथ पर पड़ी लाशें, ट्रेन की पटरियों पर रोटियों का मिलना यह क्या है सब? इन सब की वजह यही दो जून की रोटी है बरना यूं ही नहीं कोई अपने वतन और परिवार को छोड़कर परदेश जाता है।
ये दो जून की रोटी भी बड़ी कमाल की है साहिब कोई व्यक्ति इसके पीछे अपना परिवार छोड़ देता है, तो कभी किसी व्यक्ति विशेष को उसका परिवार छोड़ देता है। यह वही रोटी है यदि गरीब को मिल जाए तो उसकी भूख मिटा देती और अमीर को मिले तो उसकी भूख का शौक पूरा कर देती है। जंहा हम रोटी का दिवस तक मनाते हैं उसी देश में रोटी की बजह से कई लोग भूखें मर जाते हैं इसलिए तो हमने कहा है कि "हां साहब हर किसी को नसीब नहीं होती ये दो जून की रोटी"...
- चन्द्रभान_सिंह_लोधी
आज 2 जून है और आज एक सबसे मशहूर अवधी कहाबत है कि 2 जून की रोटी सभी को नसीब नहीं होती हैं। 2 जून की रोटी का मतलब होता है 2 टाइम की रोटी
तो ये तो सभी जानते है कि आज भी भारत में दो टाइम की रोटी हर किसी को नहीं मिलती है. कोरोना काल में जो मजदूरों का दर्द सड़को पर देखने को मिला है वो यही दो जून की रोटी का दर्द है।
आज भी भारत में गरीबी औऱ भुखमरी इतनी है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना काल में देखने को ही मिल गया है. सरकारें लाख दावा करें, पूर्व सरकारें या पार्टियां भी लाख विकास की बात करें लेकिन सच यही है जो हमे आज देखने को मिल रहा है। सड़कों पर भटकते मजदूर, बेरोजगारी का नजारा, फुटपाथ पर पड़ी लाशें, ट्रेन की पटरियों पर रोटियों का मिलना यह क्या है सब? इन सब की वजह यही दो जून की रोटी है बरना यूं ही नहीं कोई अपने वतन और परिवार को छोड़कर परदेश जाता है।
ये दो जून की रोटी भी बड़ी कमाल की है साहिब कोई व्यक्ति इसके पीछे अपना परिवार छोड़ देता है, तो कभी किसी व्यक्ति विशेष को उसका परिवार छोड़ देता है। यह वही रोटी है यदि गरीब को मिल जाए तो उसकी भूख मिटा देती और अमीर को मिले तो उसकी भूख का शौक पूरा कर देती है। जंहा हम रोटी का दिवस तक मनाते हैं उसी देश में रोटी की बजह से कई लोग भूखें मर जाते हैं इसलिए तो हमने कहा है कि "हां साहब हर किसी को नसीब नहीं होती ये दो जून की रोटी"...
- चन्द्रभान_सिंह_लोधी

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