संस्मरण गर्मी के दिन भी क्या दिन होते है ये तो गांव वाले लोग ही जानते हैं, जंहा ना मच्छर औऱ ना ही बदबू की समस्या। आज से एक साल पहले तक के वो दिन नहीं भुलाए जा रहे हैं जो हम छतों पर अपनी रात बिताया करते थे। गड़ोला गांव में थे कोई रोजगार था नहीं, गर्मी के दिन भी थे तो बाहर जाते थे तो धूप लगती थी। अब क्या करते गांव में कोई प्रेमिका भी नहीं थी जो उससे बात करके मन बहला लेते। लेकिन हां मेरे प्यारे दोस्त जरूर थे जिनसे कभी लड़कर तो कभी बातें करके मन जरूर बहल जाता था। मेरे एक दोस्त की प्रेमिका थी तो कभी-कभी उससे बात कर लेता था लेकिन वह दोस्त कहीं मुझे गलत ना समझे इस बजह से उससे भी ज्यादा बात नहीं करता था। मेरी उस दोस्त से हर दिन किसी न किसी बात को लेकर लड़ाई होती थी और ये लड़ाई कभी-कभी खूना खच्ची तक पहुंच जाती थी। लेकिन थी मजाल दोनों की कि एक घण्टे से ज्यादा बैर बंधा हो भले ही किसी भी बात को लेकर लड़ाई हुई हो। बैसे जिस गांव में मेरा ये दोस्त था तो उस गांव में कुछ सालों से 10 से 15 दिन तक ही रुकने को मिलता था और जिसके घर रुकता था वह भी कहने लगतीं थी कि बेटा तुम अब जा...