हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष ये दिन हिंदी पत्रकारिता का दिन है, सोच रहा था कि मैं भी हिंदी का पत्रकार हूं। तो कुछ लिखूं या नहीं? पर मेरे दिल के अंदर की पत्रकारिता जागी और दिल से आवाज आई कि लिखना ही चाहिए। आज के समय की की पत्रकारिता किसी से छिपी नहीं है। ये तो सभी जानते है हकीकत के पत्रकारों को अब खत्म कर दिया गया है। चार दीवारों के अंदर चेहरे पर मेकप करके वदन पर एक काला कोट पहनकर कैमरे के सामने सिर्फ चिल्लाना ही बच गया है। पहले की पत्रकारिता थी पर अब वह व्यवसाय बन गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जो पत्रकार जनता की आवाज कहलाता था। अब टीवी स्टूडियो में बैठकर वह हुकूमत की आवाज बन गया है। वरना कोरोना काल में जब मजदूर मर रहा है तो यूं ही नहीं पाकिस्तान, चीन और हिन्दू-मुस्लिम पर डिवेट ज्यादा से ज्यादा होतीं। जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि "सरकार की आलोचना अखबार नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा" लेकिन वर्तमान परिस्थिति में यह बात सिर्फ एक मजाक रह गई। क्योंकि कुछ सालों का इतिहास उठा लीजिए जिसने भी सत्ता से सवाल पूछे हैं या तो उनको निकाल दिया गया है ...