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Showing posts from May, 2020

पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष ये दिन हिंदी पत्रकारिता का दिन है, सोच रहा था कि मैं भी हिंदी का पत्रकार हूं। तो कुछ लिखूं या नहीं? पर मेरे दिल के अंदर की पत्रकारिता जागी और दिल से आवाज आई कि लिखना ही चाहिए। आज के समय की की पत्रकारिता किसी से छिपी नहीं है।  ये तो सभी जानते है हकीकत के पत्रकारों को अब खत्म कर दिया गया है। चार दीवारों के अंदर चेहरे पर मेकप करके वदन पर एक काला कोट पहनकर कैमरे के सामने सिर्फ चिल्लाना ही बच गया है। पहले की पत्रकारिता थी पर अब वह व्यवसाय बन गई हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जो पत्रकार जनता की आवाज कहलाता था। अब टीवी स्टूडियो में बैठकर वह हुकूमत की आवाज बन गया है। वरना कोरोना काल में जब मजदूर मर रहा है तो यूं ही नहीं पाकिस्तान, चीन और हिन्दू-मुस्लिम पर डिवेट ज्यादा से ज्यादा होतीं।          जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि "सरकार की आलोचना अखबार नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा" लेकिन वर्तमान परिस्थिति में यह बात सिर्फ एक मजाक रह गई। क्योंकि कुछ सालों का इतिहास उठा लीजिए जिसने भी सत्ता से सवाल पूछे हैं या तो उनको निकाल दिया गया है ...

वो चेहरा जो कोई भूल नहीं सकता

ये चेहरा पहचान के लिए किसी का मोहताज तो नहीं है, ये भी हो सकता है कि शायद पहले कुछ लोग इस चेहरे को असली नाम से नहीं जानते होंगे। लेकिन अब ये दावा के साथ कह सकता कि आज की तारीख में ये चेहरा हर किसी के दिल में बैठ सा गया है। पिछले कुछ दिनों सोशल मीडिया पर इन शख़्स का नाम किसी के लिए मसीह तो किसी के लिए भगवान तक हो बन चुका है। जी हां ये वही शख़्स हैं जिन्हें सोनू सूद कहा जाता है भले ही ये फिल्मी दुनिया के छोटे सितारे हों या रील हीरो हों लेकिन सच यही कि हकीकत की दुनिया के बड़े सितारे और रियल हीरो अब सोनू सूद को ही कहा जा रहा है। किसी के भी एक ट्वीट करने पर इतने जल्दी रिप्लाई करना और फिर दूसरे दिन उसको उसके गन्तव्य तक पहुंचा देना इतनी दरियादिली आपकी सच्ची इंसानियत होने का फर्ज अदा करती है।         जब से कोरोना आया उसके कुछ दिनों बाद से ये प्रवासी मजदूरों के लिए फ़रिश्ता बन कर उभरे हैं और अभी तक इन्होंने मीडिया आकंड़े के मुताबिक 12 हजार से ज्यादा मजदूरों को अपने खर्च पर घर भेज दिया है। इनके इस काम की जितनी सराहना की जाए बहुत कम है। इन्होंने सिर्फ मजदूरों को घर ही भेजने का का...

टिक टोक ही बैन क्यों?

कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर भारत में टिक टोक बैन करने की मांग चल रही है। ट्विटर पर भी इसे बैन करने के लिए बहुत तेजी से ट्रेंड किया जा रहा है। सबसे पहले मैं बताना चाहता हूं की टिक टॉक चीन का एक मोबाइल एप्लीकेशन है, जिसमें कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल में इंस्टॉल करके अपनी कला दिखा सकता है। इस तरह के बहुत से ऐप है जैसे कि लाइक, हेलो, शेयर चैट, स्टार मेकर और भी कई हैं जिनकी मांग अभी बैन होने के लिए नहीं उठी लेकिन टिक टोक की बस उठ रही है। अब तो बड़े-बड़े फिल्मी स्टार, पॉलीटिशियन, समाजसेवी भी टिक टोक बैन की मांग करने लगे जो टिक टोक पर वीडियो भी नहीं बनाते हैं वह भी मांग कर रहे हैं।          कुछ लोग तो टिक टॉक को अपने मोबाइल से अनइंस्टॉल करने में देश हित की बात कर रहे हैं। जैसे कि कुछ सालों से प्रथा ही चली आ रही है कि कोई भी चीज का यदि बहिष्कार कराना है तो उसे देश हित में जोड़ देते हैं। चाहे वह इंसान हो, राजनीतिक पार्टी हो या कोई भी वस्तु हो बस देश हित में जोड़ दो ताकि लोगों की भावना अपने देश के प्रति उमड़ आए और उनकी मांग पूरी हो ...

मैं मजदूर हूं

मैं मजदूर हूं मैं इस देश का निर्माता कहा जाता हूं मैं देश को अनाज उगाकर खिलाता हूं मैं खुद तो झोपड़ियों में रहता हूं  मग़र हर किसी के महल मैं ही बनाता हूं हां मैं मजदूर हूं मुझे लाचार कहो या गरीब मुझपर हंसो या मजाक उड़ाओ मग़र जब भी देश मे सकंट आता है मैं आगे खड़ा हो जाता हूं हां मैं मजदूर हूं मैं आया था शहर कुछ पैसे कमाने मैं अपने बच्चों को पढ़ा लिखा सकूं अब मैं चल पड़ा हूं पैदल घर की ओर  मैं अमीर नहीं 'चन्द्रभान' गरीब मजदूर हूं  मैं मजदूर हूं मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं खुद मेहनत कर कमाता हूं मुझे क्या खिलाएगीं ये हुकूमतें मैं तो सदियों से आत्म निर्भर हूं हां मैं मजदूर हूं मैं हर किसी को बोट देता आया हूं मैं रंक को भी राजा बनाता आया हूं पर आज मैं किसी का अपना नहीं हूं मेरी हालत पर अब मैं मजबूर हो चुका हूं मैं मजदूर था और आज भी मजदूर हूं हां मैं मजदूर हूं            - चन्द्रभान सिंह लोधी

वो मेरी मां है

वो मेरी मां है जब मैं भूखा रहता हूँ, वो अपने हाथों से खिलाती है। मैं रूठना भी चाहूं तो... वो हर हाल में मना लेती है। जब मैं नहीं सुनता उसकी बातें तो गाली देकर अपना काम करवा लेती है वो कोई औऱ नहीं मेरी मां है... जब पापा मुझे डांटते हैं तो... आँखे उसकी नम हो जाती हैं  जब पापा मुझे पैसे नहीं देते तो...  वो लड़कर पैसे दिलवा देती है। वो मुझसे नाराज कभी नहीं होती... बस शिकायतें हमेशा रहती हैं। वो कोई और नहीं मेरी मां है। ज्यादा बात तो नहीं कर पाता... मगर याद बहुत करता हूं। कुछ जानबूझकर बात नहीं करता, कुछ सोचकर बात नहीं करता... आँख से ना निकलें आंसू उसके, यही सोचकर मैं बात नहीं करता। मुझे पता रहता है कि...  फोन कटने पर रो देगी वो क्योंकि वो कोई और नहीं... मेरी प्यारी मां है...                    - चन्द्रभान_सिंह_लोधी मदर्स डे की हार्दिक शुभकामनाएं...💐💐💐

कैसी स्वतंत्रता औऱ कौन देगा ये स्वतंत्रता

हर साल 3 मई को पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। लेकिन इस बीच कई सवाल उठते हैं मीडिया को लेकर, तो इससे पहले हम बात करते है थोड़ी इस दिन के इतिहास के बारे में। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 मई को अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता स्‍वतंत्रता दिवस की घोषणा की थी। यूनेस्को महासम्मेलन के 26 वें सत्र में 1993 में इस प्रस्ताव को पास किया था। ये तो हो गया थोड़ा सा इतिहास अब बात करते हैं कि भारत में कितनी आज़ादी है ? मीडिया पहले देश के लिए एक मिशन हुआ करती थी, इस देश की आजादी में पत्रकारिता का योगदान भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन अब इसका स्तर और फ्रीडम क्या है ये तो सभी को पता है। जब से पत्रकारिता में पूंजीपतियों का पैसा आया तो फिर कंहा बची पत्रकारिता की स्वतंत्रता? रिपोर्टरों का दौर खत्म होता जा रहा है और एंकरों का दौर शुरू हो रहा है। पत्रकार यंहा trp के लिए दो हजार के नोट में भी चिप खोज लेते हैं, तो कहीं झूठी खबरें चला देते हैं। भारत में भी कुछ इसी तरह का दौर चल रहा trp के कारण पत्रकार मर्यादा, संस्कार, लोगों का सम्मान भी भूलते जा रहे हैं। लेकिन इसमें कुछ स्तर तक पत्रकारों या tv एंकरों की ग...