चारों तरफ शोर शराबा है, राम नाम का नारा गूंज रहा है। मेरे गांव की बिजली गोल है, अब कोई नहीं बोल रहा है। चारों तरफ यात्राएं हो रही हैं, नेता जी के नारे लगाए जा रहे हैं। मेरे गांव में पानी का अकाल पड़ गया, अब न कोई आवाज उठा रहा है। चारों तरफ कन्याएं भोज हो रहीं, लोग धर्म समझकर लाभ उठा रहे हैं। मेरे गांव में किसानों की फसलें जल गईं, अब न कोई मुआवजा दिलवा रहा है। गायों पर खूब राजनीति हो रही है, हिन्दू-मुसलमान में लड़वा रहे हैं। भूख-प्यास से मवेशी रोज मर रहे हैं, अब ना कोई दल आगे आ रहा है। आज फलाने नेता जी से मुलाकात हुई, ऐसीं फेसबुक पर पोस्ट हो रहीं हैं, मेरे क्षेत्र में गरीबों की हजार समस्याएं हैं, अब इनकी मांग ना कोई कर रहा है। "चन्द्रभान" दर्द बहुत है लोगों का, मगर अब ना कोई लिख रहा है। मेरे गांव के समस्याओं से प्यासे मर रहे, अब ना कोई राहत का पानी पिला रहा है। - चन्द्रभान सिंह लोधी
"हां साहब सबको नसीब नहीं होती ये 2 जून की रोटी" आज 2 जून है और आज एक सबसे मशहूर अवधी कहाबत है कि 2 जून की रोटी सभी को नसीब नहीं होती हैं। 2 जून की रोटी का मतलब होता है 2 टाइम की रोटी तो ये तो सभी जानते है कि आज भी भारत में दो टाइम की रोटी हर किसी को नहीं मिलती है. कोरोना काल में जो मजदूरों का दर्द सड़को पर देखने को मिला है वो यही दो जून की रोटी का दर्द है। आज भी भारत में गरीबी औऱ भुखमरी इतनी है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना काल में देखने को ही मिल गया है. सरकारें लाख दावा करें, पूर्व सरकारें या पार्टियां भी लाख विकास की बात करें लेकिन सच यही है जो हमे आज देखने को मिल रहा है। सड़कों पर भटकते मजदूर, बेरोजगारी का नजारा, फुटपाथ पर पड़ी लाशें, ट्रेन की पटरियों पर रोटियों का मिलना यह क्या है सब? इन सब की वजह यही दो जून की रोटी है बरना यूं ही नहीं कोई अपने वतन और परिवार को छोड़कर परदेश जाता है। ये दो जून की रोटी भी बड़ी कमाल की है साहिब कोई व्यक्ति इसके पीछे अपना परिवार छोड़ देता है, तो कभी किसी व्यक्ति विशेष को उसका परिवार छोड़ देता है। यह वही ...