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कैसी स्वतंत्रता औऱ कौन देगा ये स्वतंत्रता


हर साल 3 मई को पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। लेकिन इस बीच कई सवाल उठते हैं मीडिया को लेकर, तो इससे पहले हम बात करते है थोड़ी इस दिन के इतिहास के बारे में। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 मई को अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता स्‍वतंत्रता दिवस की घोषणा की थी। यूनेस्को महासम्मेलन के 26 वें सत्र में 1993 में इस प्रस्ताव को पास किया था। ये तो हो गया थोड़ा सा इतिहास अब बात करते हैं कि भारत में कितनी आज़ादी है ? मीडिया पहले देश के लिए एक मिशन हुआ करती थी, इस देश की आजादी में पत्रकारिता का योगदान भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन अब इसका स्तर और फ्रीडम क्या है ये तो सभी को पता है। जब से पत्रकारिता में पूंजीपतियों का पैसा आया तो फिर कंहा बची पत्रकारिता की स्वतंत्रता? रिपोर्टरों का दौर खत्म होता जा रहा है और एंकरों का दौर शुरू हो रहा है। पत्रकार यंहा trp के लिए दो हजार के नोट में भी चिप खोज लेते हैं, तो कहीं झूठी खबरें चला देते हैं। भारत में भी कुछ इसी तरह का दौर चल रहा trp के कारण पत्रकार मर्यादा, संस्कार, लोगों का सम्मान भी भूलते जा रहे हैं। लेकिन इसमें कुछ स्तर तक पत्रकारों या tv एंकरों की गलती भी नहीं मान सकते हैं। क्योंकि वहां बैठे मालिको ने अब उनको अपना पिठ्ठू बना लिया है। हालांकि देश अभी भी ऐसे कई बेबसाइट पोर्टल चैनल और अखवार है जो सच लिख रहे हैं। कुछ लोग ये लेख पढ़कर मुझपर भी सवाल खड़ा कर सकते हैं कि तुम खुद पत्रकार हो और इस तरह लिख रहे हो तो यह सच्चाई है जो मैं लिखकर अपना धर्म निभा रहा हूं। भारत में यदि प्रेस के दर्जे की बात की जाए तो इसे देश के चौथे स्तंभ का दर्जा मिला है लेकिन क्या वाकई ऐसा है? इस तरह से कई सवाल उठते हैं। कई सरकारों ने प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश की है और वर्तमान में भी हो रही है। जब देश में कुछ सालों पहले कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। तब देश में इमरजेंसी लगाई तब प्रेस की आज़ादी छीन ली गई थी। उस समय भी पत्रकारों की कलम की स्याही का इस्तेमाल किया जा रहा था। उसके बाद यदि हम वर्तमान समय की बात करें तो भी इसी तरह का हो रहा है। कोई पत्रकार प्रधानमंत्री पर सवाल नहीं उठा सकता यदि जिसने हिमाकत की तो उसे नोकरी से निकाल दिया जाता है। तो फिर क्या ये स्वतंत्रता है? देश में ऐसे कई पत्रकार है जो सत्ता से रेगुलर सवाल पूछते थे तो उनको अपनी नोकरी खोनी पड़ी, कुछ चैनल ऐसे भी हैं जंहा सत्ता धारी पार्टी के प्रवक्ता डिवेट में ही नहीं जाते, सरकार उनको विज्ञापन ही नहीं देती। तो क्या नये स्वतंत्रता है? मीडिया विपक्ष से सवाल करती है कि अर्थव्यवस्था कैसे सुधरेगी और सत्ता से आम कैसे खाते उसका तरीका पूछती है तो फिर आप ही अंदाजा लगा सकते हो कि क्या स्वंत्रता होगी। देश के कई हिस्सों में पत्रकारों को मार दिया जाता है गौरी लंकेश जैसी पत्रकारों को गोली से मार दिया जाता है। अर्नब गोस्वामी का उस दिन बोलना बहुत ही अपमान जनक था और मैने खुद पुरजोर विरोध किया था उसकी देश भर में 200 से ज्यादा fir हुई। अर्नब को सजा देना अब कानून का काम था लेकिन उसपर हमला होना सही नहीं था। अंत में मेरा आप सभी से तो यही कहना है कि यदि इस समय आपके पास स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया है तो आप भी पत्रकार हो। आप निडर होकर वही लिखो जो सच है। चाहे सत्ता के पक्ष का हो या विपक्ष के पक्ष का हो। क्योंकि पत्रकार एक आईने की भूमिका में रहेगा तो पत्रकार कहलाएगा और यदि वही जजमेंट पास करने लगा तो फिर क्या? शायद ये हो भी रहा होगा लेकिन हमें अपनी जिम्मेदारी हमेशा गणेश शंकर विद्यार्थी बन कर निभानी है कि यदि हिन्दू मुस्लिम दंगा होगा तो उन्हें समझाना है बल्कि डिवेट करके उस दंगे को युद्ध में नहीं बदलना। पत्रकारिता के इस संकट के दौर में पत्रकारिता स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... - चन्द्रभान सिंह लोधी ( नोट- ये लेखक के निजी विचार हैं इसमें किसी से कोई ताल्लुक नहीं है)

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कोई बोल रहा है ?

चारों तरफ शोर शराबा है, राम नाम का नारा गूंज रहा है। मेरे गांव की बिजली गोल है, अब कोई नहीं बोल रहा है। चारों तरफ यात्राएं हो रही हैं, नेता जी के नारे लगाए जा रहे हैं। मेरे गांव में पानी का अकाल पड़ गया, अब न कोई आवाज उठा रहा है। चारों तरफ कन्याएं भोज हो रहीं, लोग धर्म समझकर लाभ उठा रहे हैं। मेरे गांव में किसानों की फसलें जल गईं, अब न कोई मुआवजा दिलवा रहा है। गायों पर खूब राजनीति हो रही है, हिन्दू-मुसलमान में लड़वा रहे हैं। भूख-प्यास से मवेशी रोज मर रहे हैं, अब ना कोई दल आगे आ रहा है। आज फलाने नेता जी से मुलाकात हुई, ऐसीं फेसबुक पर पोस्ट हो रहीं हैं, मेरे क्षेत्र में गरीबों की हजार समस्याएं हैं, अब इनकी मांग ना कोई कर रहा है। "चन्द्रभान" दर्द बहुत है लोगों का, मगर अब ना कोई लिख रहा है। मेरे गांव के समस्याओं से प्यासे मर रहे, अब ना कोई राहत का पानी पिला रहा है।                    - चन्द्रभान सिंह लोधी

वो मेरी मां है

वो मेरी मां है जब मैं भूखा रहता हूँ, वो अपने हाथों से खिलाती है। मैं रूठना भी चाहूं तो... वो हर हाल में मना लेती है। जब मैं नहीं सुनता उसकी बातें तो गाली देकर अपना काम करवा लेती है वो कोई औऱ नहीं मेरी मां है... जब पापा मुझे डांटते हैं तो... आँखे उसकी नम हो जाती हैं  जब पापा मुझे पैसे नहीं देते तो...  वो लड़कर पैसे दिलवा देती है। वो मुझसे नाराज कभी नहीं होती... बस शिकायतें हमेशा रहती हैं। वो कोई और नहीं मेरी मां है। ज्यादा बात तो नहीं कर पाता... मगर याद बहुत करता हूं। कुछ जानबूझकर बात नहीं करता, कुछ सोचकर बात नहीं करता... आँख से ना निकलें आंसू उसके, यही सोचकर मैं बात नहीं करता। मुझे पता रहता है कि...  फोन कटने पर रो देगी वो क्योंकि वो कोई और नहीं... मेरी प्यारी मां है...                    - चन्द्रभान_सिंह_लोधी मदर्स डे की हार्दिक शुभकामनाएं...💐💐💐

आखिर ये कैसा प्रदर्शन है?