संस्मरण
गर्मी के दिन भी क्या दिन होते है ये तो गांव वाले लोग ही जानते हैं, जंहा ना मच्छर औऱ ना ही बदबू की समस्या। आज से एक साल पहले तक के वो दिन नहीं भुलाए जा रहे हैं जो हम छतों पर अपनी रात बिताया
करते थे। गड़ोला गांव में थे कोई रोजगार था नहीं, गर्मी के दिन भी थे तो बाहर जाते थे तो धूप लगती थी। अब क्या करते गांव में कोई प्रेमिका भी नहीं थी जो उससे बात करके मन बहला लेते। लेकिन हां मेरे प्यारे दोस्त जरूर थे जिनसे कभी लड़कर तो कभी बातें करके मन जरूर बहल जाता था। मेरे एक दोस्त की प्रेमिका थी तो कभी-कभी उससे बात कर लेता था लेकिन वह दोस्त कहीं मुझे गलत ना समझे इस बजह से उससे भी ज्यादा बात नहीं करता था।
मेरी उस दोस्त से हर दिन किसी न किसी बात को लेकर लड़ाई होती थी और ये लड़ाई कभी-कभी खूना खच्ची तक पहुंच जाती थी। लेकिन थी मजाल दोनों की कि एक घण्टे से ज्यादा बैर बंधा हो भले ही किसी भी बात को लेकर लड़ाई हुई हो। बैसे जिस गांव में मेरा ये दोस्त था तो उस गांव में कुछ सालों से 10 से 15 दिन तक ही रुकने को मिलता था और जिसके घर रुकता था वह भी कहने लगतीं थी कि बेटा तुम अब जाओ क्योंकि मैं सागर में पढ़ाई करता था। गर्मी अच्छी होने लगी थी मैं भी उसी गांव में था, दिन भर कहीं ना कहीं बैठा रहता था अपने दोस्तों के साथ गप लड़ाता रहता था खुद भी परेशान दूसरो को भी परेशान करना तो अपना शुरू से काम ही रहा बैसे ये मैं नहीं दूसरे लोग कहते हैं।
जैसे ही रात होती थी तो मैं ज्यादा तर उसके छत पर सोया करता था। कभी वो भी मेरे घर आ जाता था मेरे छत पर सोने के लिए तो कभी मैं उसके छत पर चला जाता था। हम दोनों की लड़ाई हो जाती थी कि आज तुम आओगे मेरे छत वो कहता था नहीं तुम आओ मेरे छत तो ऐसे में कभी-कभी दोनों अपनी अपनी जिद पर अड़े रहते थे। गांव में वैसे मेरा घूमना मेरे घर वालों को अच्छा नहीं लगता था। मेरे घर वालों को लगता था कि मैं ज्यादा घूमता हूँ तो कोई कुछ कर न दे इसलिए वो लोग मना करते रहते थे।
मैं जब अपने रूम में सोने के लिए जाता था तो कभी-कभी मेरे घर के लोग बाहर से गेट लगा दिया करते थे। एक दिन ऐसा ही हुआ और उस दोस्त का फोन आया करीब 11 बजे कि मेरे छत पर आओ जल्दी मुझे अर्जेंट काम है। मैं अपने रूम से नीचे आया तो देखा कि बाहर से गेट लगे हुए हैं अब कैसे जाता तो फिर फोन लगा कर बोल दिया कि मैं नहीं आ पाऊँगा तो उसको यकीन ही नहीं हुआ। यकीन भी कैसे होता बैसे किसके घर वाले बाहर से गेट बंद करते हैं और वो नाराज हो गया ये कह कर कि कल मैं तुम्हारे छत नहीं आया इसलिए तुम भी नहीं आ रहे हो। अब मैने सोचा कि देखते हैं उनको एकाद दिन मजा सिखाते है। समय रात को कम ही हुआ था और हम दोनों मेरे छत पर सोने के लिए गए वो आ नहीं रहा था लेकिन मैं ये बोल कर लाया कि अभी चले जाने जब तक अपन बातें करेंगे। छत पर जल्दी जाने का यही नुकसान होता था कि गेट बंद कर दिए जाते थे और यही हुआ। हम दोनों बातें करते रहे अब जाने लगा तो गेट खोले लेकिन बंद थे तब उसको उस दिन वाली बात पर यकीन आया।
कहते हैं ना कि तीन चार दिन एक ही सब्जी खाते रहो तो अब उसको खाने का मन नहीं करता है लेकिन यह कहावत भी झूठ हो जाएगी जब उस सब्जी को आप दिल से खाते रहेंगे। अब यंहा मैने ये कहाबत क्यों जोड़ी वो आप लोग समझिए। जब छत पर सोते हैं तो एक अलग ही फील होता है, चांदो का टूटना तो मस्ती में तारों का गिनना ये अब याद आता। कभी-कभी उससे वो बात करना जो पता रहती थी कि इस बात से इसको गुस्सा आएगा फिर भी करनी है तो लेटे लेटे ही लड़ाई हो जानी अब बहुत याद आती है। प्यास लगी है अब पानी लेने नीचे जाना पड़ेगा तो वो जानबूझकर नहीं जाएगा तो मेरे घर चले जाने की धमकी अब याद आती है। वो मुझसे बात करेगा तो मैं उसकी हर बात काटता था जिससे वो अपने ही छत से नीचे सोने चले जाना अब याद आता है। उससे बात तो कर लेंगे उसे, देख भी लेंगे लेकिन वो छत नहीं होगा। उन दिनों से भी ज्यादा अब बदल गए हैं दिन मग़र वो छत पर सोना अब याद आता है।
- चन्द्रभान सिंह लोधी

Comments
Post a Comment